
बचपन में जब इलाहाबाद भैया के साथ पढ़ाई के लिए जाना हुआ तो मां का साथ छूट गया ......पर शहर जाने की खुशी में यह दर्द कम ही महसूस हुआ ......पहली बार ट्रेन का सफर करने का इंतजार लिए स्टेशन पर बैठा चार घण्टे काटना बेहद मुश्किल हो रहा था .......मई के महीने में तपती धूप से बचने के लिए पेड़ों की छाया में गर्म हवा का थपेड़ा गालों पर किसी जोरदार थप्पड़ से कम नहीं लगा......जैसे तैसे ट्रेन आयी ( पैसेन्जर) हम और भैया चढ़ गये ....सारी सीटे भरी थी पहले से ही और...