उसने चाहा था घरबना मकानखप गयी जिंदगीवह सुखी होना चाहता थाइसलिए मारता रहा मच्छरमक्खी, तिलचट्टे ...फांसता रहा चूहेसफर में जैसे डूबा रहे कोई सस्ते उपन्यास में कोईकि यूं ही बेमतलब कट गयी उम्रअनजान किसी रेलवे स्टेशन परकोई कुल्हड़ में पिये फीकी चाय और भूल जाएवह भूल गया जवानी के सपनेआदर्श, क्रांतिकारी योजनाएँ उस लड़की का चेहराविज्ञापन के बाजार मेंवह बिकता रहालगातार बेचता रहा ------अपने हिस्से की धूपअपने हिस्से की चाँदनीऔर मर गया...