एक मै मौनतटस्थ मन्दिर की सूनी सीढीयो काझिलमिलाता दृश्य लिएयापीपल की घनी बाहों सेझरेपत्तो की शुष्क अधरों की प्यास लिएमै बहती हूखुद राह बनातीतोड़ धरती की छातीमोड़ से हरआगे बढ़करलौट करफिर कभी नही आतीसमय की नदी हूएक मै मौनगहराई से मेरा नाता हैसत्य की सतह का स्पर्श जो नही कर पाता हैउसे इसजग -जल मेतैरना कहा सचमुच आता हैपारदर्शी देह के कांच मे अपनेमौसम के हर परिवर्तन काअक्श लीयेसोचतीकभी थाम करसदैव रहूबादलो के जल -मग्न छोरधरा के जीवित पाषाणों कीलुभावनी आकृतियों के आकर्षण कोंछोड़यावन वृक्षो की जड़ो कामेरे लिएमोह का दृड़ नातातोड़मै चाहती बहती रहू निरंतरक्षण...