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बुधवार, 8 अप्रैल 2009

क्या हम सब बदमाश हैं पिंकी....??[बाल मन ]- भूतनाथ जी

"पिंकी,ऐ क्या मैं बदमाश हूँ.....??""नहीं तो,कौन कहता है....??""देख ना,मम्मी हर समय मुझे बदमाश-बदमाश कह कर डांटती ही रहती है.....??""ओ....!!वो तो मेरी मम्मी भी मुझे दिन-रात यही कहती रहती है,सौ-सौ बार से ज्यादा डांटती होंगी मेरी मम्मी दिन भर में मुझे....!!और पापा भी तो कम नहीं नहीं है....एक तो रात को घर लौटते हैं....ऊपर से मम्मी उन्हें जो भी पढ़ा देती हैं,उसी पर मेरी वाट लगा देते हैं....!!""हाँ यार !!मेरा भी यही हाल है...और मेरा-तेरा ही क्यों हमारे सब दोस्तों का भी तो यही हाल है...सोचते हैं कि रात को पापा के आते ही उनको मम्मी के बारे में बताएँगे....कि...

रिश्ते.......................निर्मला कपिला जी

ये रिश्ते अजीब रिश्ते,कभी आगतो कभी ठंड़ी बर्फनहीं रहते,एक से सदाबदलते हैं ऐसेजैसे मौसम के पहरउगते हैंसुहाने लगते हैंबैसाख के सूरज की,लौ फूटने से पहलेपहर जैसे,बढ़ते हैंभागते हैं,जेठ आषाढ़ कीचिलचिलाती धूप कीसांसों जैसेपड़ जाती है दरारेंसावन भादों केकड़कते मेघों जैसेबरसतेऔर बह जातेबरसाती नदी नालों जैसेरह जाती हैं,बस यादेंपौष माघ कीसर्द रातों मेंदुबकी सी,मन के किसी कोने मेंऔर निरन्तरचलता रहताचलता रहतारिश्तों कायह सफर।।यह रचना " सुबह से पहले " कविता संग्रह से प्रकाशित की गयी है...