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शनिवार, 4 अप्रैल 2009

ज़िन्दगी...............[एक कविता] निर्मला कपिला जी की प्रस्तुति

ज़िन्दगीखिलते फूल सी मुसकान है जिन्दगी समझो तो बड़ी आसान हैखुशी से जिओ तो सदा बहार है जिन्दगीदुख मे तलवार की धार है जिन्दगीपतझर बसन्तो का सिलसिला है जिन्दगीकभी इनायतें तो कभी गिला है जिन्दगीकभी हसीना सी चाल सी मटकती है जिन्दगी कभी सूखे पते सी भटकती है जिन्दगीआगे बढ़ने वालों के लिये पैगाम है जिन्दगी भटकने वालो की मयखाने मे गुमनाम है ज़िन्दगीनिराशा मे जी का जंजाल है जिन्दगीआशा मे संगीत सी सुरताल है ज़िन्दगीकहीं मखमली बिस्तर पर सोती जिन्दगी कभी फुटपाथ पर पडी रोती है जिन्दगीकभी होती थी दिलबरे जिन्दगी आज चौराहे पे खडी है शरमसार जिन्दगी सदिओं से माँ...