कहीं छांव नहीं सभी धूप लगेआज पांव में भी गर्मी खूब लगेकही जलता बदन पसीना बहेहर डगर पे अब प्यास बढ़ेसतह से वृक्ष वीरान हुयेखेती की जमीं शमशान हुईपानी की सतह भी द्घटती गईआबादी जहां की बढ़ती ही गईगर्मी की तपन जब खूब बढ़ेगीसूखा सारा हर देश बनेगापेड़ सतह से जब मिट जायेगाइंसान की आबादी खुद-ब-खुद द्घट जायगीवृक्ष लगा तू धरती बचाधरती पे है सारा इंसान बसाजब पेड़ नहीं पानी भी नहींबिन पानी फिर इंसान कहां...