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रविवार, 31 जनवरी 2010

कविता प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त --- रौद्र -रूद्र [कविता]--प्रताप सिंह

प्रशस्त शस्त शैल मध्य चिर विविक्त कन्दराशिला प्रगल्भ पुष्ट, व्याघ्र चर्म था बिछा हुआअनादि आदि देव थे समाधि में रमे हुएसती वियोग का अथाह दाह प्राण में लियेविरक्त, भक्त, सृष्टि के सभी क्रिया कलाप सेहरे त्रिलोक-ताप जो, जले विछोह ताप सेसमाधि साध कर रहे विषाद की विवेचनाविदीर्ण जीर्ण प्राण की बनी सुत्राण साधनाललाट चन्द्र मंद आज छिन्न भिन्न चन्द्रिकाकराल व्याल पीटते कपाल खोह भित्तिकाप्रदाह सिक्त डोलती मिटा तरंग गंग कागणादि आदि घूमते अतेज, तेज भंग थाउधर विनाश में लगा असुर नरेश "तारका"अदभ्र शक्ति, तेज, ताप बाहु का अतुल्य थामिला जो दिव्य-वर बना अमर्त्य,...