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गुरुवार, 20 मई 2010

ढलती शाम..............(कविता).......... सुमन 'मीत'

अकसर देखा करती हूँशाम ढलते-2 पंछियों का झुंड सिमट आता है एक नपे तुले क्षितिज में उड़ते हैं जो दिनभर खुले आसमां में अपनी अलबेली उड़ान पर.... शाम की इस बेला में साथी का सानिध्यपंखों की चंचलताउनकी स्वर लहरी प्रतीत होती एक पर्व सीउनके चुहलपन से बनती कुछ आकृतियां और दिखने लगतामनभावन चलचित्र फिर शनै: शनै: ढल जाता शाम का यौवन उभर आते हैंखाली गगन में कुछ काले...

बुन्देली लोकसंस्कृति और बुन्देली लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य

बुन्देली लोकसंस्कृति और बुन्देली लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने...