मुझे नहीं है ज्ञात सखे, किस कर्म में मैं सुख पाउँगा|| किस धर्मं का होकर जीवन भर, अपना धर्मं निभाऊंगा| सत्य-पिपासा से बंधित मै, नित्य नए आयाम ढूंढ़ता || नियमों के धरातल को कुरेदने की इच्छा रखता | अवलोकन-हेतु बहुत कुछ है, संभवतः चराचर में ||पर मेरी-मृगतृष्णा मुझको, उसका भान न होने देती | नेत्र-बंद, कर्ण-अविकसित, मस्तिष्क अज्ञान-चरम पर है ||ज्ञान-तंतु, सभी मूर्छित; ... संजीवनी-पिपासु हैं | क्षीर-सिन्धु का नीर भी मेरे, किसी काम न आ पाया |इस दयनीय अवस्था में मै, कैसे तुझको अपनाऊँ … || मैं अभी, खुद से अपरिचित; कैसे तेरा हो जाऊँ...