दर्द आजबयां करना चाहता थाअपनी पीड़ा कोजो उसे असहाय कर चली थीजब से वहउसके भीतर पली थीचिंता के साथघुल रही थी उसकी हड्डियां भींउसके रोम छिद्रसिहर उठते उसकी चुभन सेआंसुओ के वेग मेंनिशब्द मौन खड़ा वहहोठों को भींचकरदेखता उसकी जड़ता कोहठीली मुस्कान पपड़ाये हुये होठों परसफेद धारियों मेंरक्त की लालिमा लाकरउसे मन ही मन कुंठित करतीआज पूरे वेग सेवह झटकना चाहता थागुजरना चाहता था हद के परेहताशा और निराशा केपकड़ना चाहता थाआस की एक नन्हीं किरणजो इस दर्द का अंत कर सकती...