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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

अलमारी----(कविता)----मोनिका गुप्ता

कमरे मे माँ की अलमारी नही अलमारीनुमा पूरा कमरा है जिसमे मेरे लिए सूट है सामी के लिए खिलौना है इनके लिए परफ्यूम है मणि के लिए चाकलेट है एक जोडी चप्पल है सेल मे खरीदा आचार,मुरब्बा और मसाला है बर्तनो का सैट हैशगुन के लिफाफा है जो जो जब जब याद आता हैवो इसमे भरती जाती हैं ताकि मेरे आने परकुछ देना भूल ना जाएसच, ये अलमारी नही अलमारीनुमा पूरा कमरा...