लम्हे वक्त की धरती पर लम्हों के निशाँ कभी नहीं बनते !! लम्हे तो वैसे ही होते हैं जैसे समंदर की छाती पर अलबेली-अलमस्त लहरें शोर तो बहुत करती आती हैं मगर अगले ही पल सब कुछ ख़त्म !! आदमी आदमी बोलता बहुत है सच बताऊँ !! आदमी अपनी बोली में झगड़ता बहुत है !! सुख सुख पेड़ की मीठी छावं है मगर मिलती है वह धरती के बहुत गहरे से जड़-तना-डाली-पत्ते बनकर बहुत बरसों बाद !! चूहाआदमी !! एक बहुत बड़ा चूहा है जो खाता रहता है दिन और रात धरती को कुतर-कुतर रेपिस्ट आदमी !! एक बहुत बड़ा रेपिस्ट...