नासमझ कुछ समझता है कभी-कभीबादल क्यूँ बरसता है कहीं-कहींचाँद क्यूँ निकलता है कभी-कभीये बात मेरी समझ में तो आ जाएगीवो क्यूँ नही समझता है कभी-कभीरात मस्त हो क्यूँ चांदनी को बुलाती है...दिन क्यों बदगुमाँ हो जाता है कभी-कभीमैं समझाता ही नहीं उसको कुछ भी,उस वक्त वो कुछ समझता है कभी-कभीचाँद, चाँदनी की जगह पर बैठा है सदियों से,सूरज ना चल कर भी, चलता है सदियों...