हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

रविवार, 29 मार्च 2009

एक कविता [निर्मला कपिला जी प्रस्तुति]

अतीत कहाँ खो गयावो अतीत कहाँ खो गयाजब मैं थीतुम्हारी धातीतुम्हारी भार्यातुम थे मेरे स्वामीमेरे पालनहारमैं थी समर्पिततुम को अर्पितअबला, कान्ताकामिनी,रमनीतुम थे मेरेबल,भर्ताकान्त कामदेवतुम मेरे पालनहामुझ पर् निस्सारमेरी आँखों मे देखा करतेमेरी पीडा समझा करतेतुम थके हारेबाहरी उलझनों के मारेमेरे आँचल की छाँव मेआ सिमटतेमेरा तन मनतेरी सेवा कआतुर हो उठतेफिर होतीरात की तन्हाईचंचल मन्मथअनुग्रह, अनुकम्पामित जातीसब तकरारेंएक लय हो जातीदोनो की धुनकी की तारेंआह्! वो लयवो सुरकहाँ खो गयामेरी पीढी का सुरबेसुर क्यों हो गयाआज नारी हो गयीअर्पित से दर्पितसमर्पित से...