
मंदिरों की घंटियों की गूँज से ,शंखनाद की ध्वनियों सेवीररस से भरे जोशीले गीत सेनव प्रभात की लालिमा ली हुई सुबह से ,कल्पित भारत वर्ष की छवि आँखों में रच बस जाती है लेकिननंगे बदन घूमते बच्चों को ,कुपोषण और संक्रमण से जूझती गर्भवती महिला को और चिचिलाती धुप में मजार पर बैठा गंदे और बदबूदार उस इन्सान को तो बदल जाती है आँखों में बसी तस्वीर ,फिर सोचता हूँइस भीड़ तंत्र के बारे में ,जो व्यवस्था और व्यवस्थापक के बीच लड़ रहा है दो जून की रोटी को ,तब बदल जाती...