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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

अगीत...........डा श्याम गुप्त

(ये प्रेम-अगीत, अतुकांत काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत’ में निबद्ध हैं) (१)गीत तुम्हारे मैंने गाये,अश्रु नयन में भर-भर आये,याद तुम्हारी घिर-घिर आई;गीत नहीं बन पाये मेरे।अब तो तेरी ही सरगम पर,मेरे गीत ढला करते हैं;मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,मुझसे ही होगये पराये। (२)जब-जब तेरे आंसू छलके,सींच लिया था मन का उपवन;मेरे आंसू तेरे मन के,कोने को भी भिगो न पाये ।रीत गयी नयनों की गगरी,तार नहीं जुड पाये मन के ;पर आवाज मुझे देदेना,जब भी आंसू छलकें तेरे। (३)श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,तेरे गीत सज़ा मेरा मन;प्रियतम तेरी विरह-पीर...

दुम दबाकर.......(बाल कहानी) ......विमला भंडारी

काली बिल्ली ने सफेद बिल्ली को देखा और सफेद ने काली को। काली ने खुश होकर सफेद से कहा- ‘‘तुम्हें देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।’’‘‘मुझे भी’’ सफेद ने जवाब दिया।‘‘कहां रहती हो?’’ काली ने पूछा।‘‘अभी नई-नई आई हूं, रहने की जगह तलाश कर रही हूं।’’‘‘मेरे घर रहोगी?’’ काली बिल्ली ने उससे आग्रह किया।‘‘मैं अकेली रहती हूं तुम साथ रहोगी तो अच्छा लगेगा।’’सफेद बिल्ली खुश होकर काली के साथ उसके घर चल दी। दोनों घर पहुंची।‘‘वाह! तुम्हारा घर तो बहुत सुन्दर है। क्या खूब तुमने...