(ये प्रेम-अगीत, अतुकांत काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत’ में निबद्ध हैं) (१)गीत तुम्हारे मैंने गाये,अश्रु नयन में भर-भर आये,याद तुम्हारी घिर-घिर आई;गीत नहीं बन पाये मेरे।अब तो तेरी ही सरगम पर,मेरे गीत ढला करते हैं;मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,मुझसे ही होगये पराये। (२)जब-जब तेरे आंसू छलके,सींच लिया था मन का उपवन;मेरे आंसू तेरे मन के,कोने को भी भिगो न पाये ।रीत गयी नयनों की गगरी,तार नहीं जुड पाये मन के ;पर आवाज मुझे देदेना,जब भी आंसू छलकें तेरे। (३)श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,तेरे गीत सज़ा मेरा मन;प्रियतम तेरी विरह-पीर...