तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़ेवह सांवली सी लड़की,कर रही थी कोशिश शायद ढक पाये तन को अपने,हर बार ही होती शिकार वहअसफलता और हीनता कासमाज की क्रूर व निर्दयी निगाहेंघूर रहीं थी उसके खुलें तन को,हाथ में लिए खुरपे सेचिलचिलाती धूप के तलेतोड़ रही थी वह पेड़ो से छालऔर कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपनेतन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़ेवह सावंली सी लड़की...