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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

कभी सोचा ना था


कभी सोचा ना था की रुकना पङेगा !
इस जिन्दगी मे पीसना भी पङेगा !!
लोग कहते रह गये मै कभी झुका नही !
मै सहता रह गया लेकिन कभी टुटा नही !!
प्यार देता रह गया हाथ आया कुछ नही!
मौत के बाद साथ आया कुछ नही !!
यहा हर तरफ है दर्द, नफरत प्यार पाया कुछ नही !
लोग की इस सोच का अंदाज आया कुछ नही !!
मै प्यार करता हू सभी से अपना-पराया कुछ नही !
मै बनू सच्चा मनुष्य है इतर सपना कुछ नही !!
लोगो के मै काम आंऊ और इच्छा कुछ नही !
प्यार मै दू सभी को नफरत मै करू नही !!

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

द्रोपदी पत्र....डा श्याम गुप्त

( अगीत में )
हे धर्मराज!
मैं बन्धन थी ,
समाज व संस्कार के लिए ,
दिनभर खटती थी ,
गृह कार्य में,
पति परिवार पुरुष की सेवा में
आज , मैं मुक्त हूँ,
बड़ी कंपनी की सेवा में नियुक्त हूँ,
स्वेच्छा से दिनरात खटती हूँ;
अन्य पुरुषों के मातहत रहकरकंपनी की सेवा में

रविवार, 18 अप्रैल 2010

अगीत -----डा श्याम गुप्त के पांच अगीत ....

( नव अगीत ---अगीत विधा का यह एक नवीन छंद है---३ से ५ तक पंक्तियाँ , तुकांत बंधन नहीं . )

१. नज़दीकियाँ -

मोबाइल,
उनके पास भी है
हमारे पास भी है ;
हम इतने करीब हैं कि ,
अभी तक नहीं मिलपाये हैं |

२. झुनुझुना --

चुनाव हारने के बाद 

वे झुनुझुना बजा रहे हैं ;
और क्या करें 
समझ नहीं पारहे हैं |

३.दूरियां---
दूरियां ,
 दिलों को करीब लाती हैं;
इन्तजार के बाद,
मिलन केअनुभूति,
अनूठी हो जाती है ।

४.समत्व---
जो आधि व व्याधि
दोनों में ही सम रहता है;
उसे ही शास्त्र,
समाधिस्थ व समतावादी कहता है ।

५.मूर्ख--
कुत्ते की उस पूंछ के समान है,
जो नतो गुप्त अन्ग ही ढकती है
न मच्छरों के उडाने के काम आती है।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

अगीत...........डा श्याम गुप्त

(ये प्रेम-अगीत, अतुकांत काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत’ में निबद्ध हैं)


(१)
गीत तुम्हारे मैंने गाये,
अश्रु नयन में भर-भर आये,
याद तुम्हारी घिर-घिर आई;
गीत नहीं बन पाये मेरे।
अब तो तेरी ही सरगम पर,
मेरे गीत ढला करते हैं;
मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,
मुझसे ही होगये पराये।

(२)
जब-जब तेरे आंसू छलके,
सींच लिया था मन का उपवन;
मेरे आंसू तेरे मन के,
कोने को भी भिगो न पाये ।
रीत गयी नयनों की गगरी,
तार नहीं जुड पाये मन के ;
पर आवाज मुझे देदेना,
जब भी आंसू छलकें तेरे।

(३)
श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,
तेरे गीत सज़ा मेरा मन;
प्रियतम तेरी विरह-पीर में ,
पतझड सा वीरान होगया।
जैसे धुन्धलाये शब्दों की,
धुन्धले अर्ध-मिटे चित्रों की;
कला बीथिका एक पुरानी।

(४)
तुम जो सदा कहा करतींथी,
मीत सदा मेरे बन रहना ;
तुमने ही मुख फ़ेर लिया क्यों,
मैने तो कुछ नहीं कहा था।
शायद तुमको नहीं पता था,
मीत भला कहते हैं किसको;
मीत शब्द को नहीं पढा था,
तुमने मन के शब्द-कोश में।

(५)
बालू से, सागर के तट पर,
खूब घरोंदे गये उकेरे;
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा लेगयी;
छोड गयी कुछ घोंघे-सीपी,
सजा लिये हमने दामन में।

(६)
तेर मन की नर्म छुअन को,
वैरी मन पहचान न पाया।
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया।
अब बैठा यह सोच रहा हूं,
तुमने क्यों न मुझे समझाया ।
ग्यान ध्यान तप योग धारणा,
में, मैंने इस मन को रमाया;
यह भी तो माया-संभ्रम है,
यूंही हुआ पराया तुमसे ॥

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

गीत तुम्हारे मैंने गाये--------[अगीत]-------डाo श्याम गुप्त

गीत तुम्हारे मैंने गाये,
अश्रु नयन में भर-भर आये,
याद तुम्हारी घिर-घिर आई;
गीत नहीं बन पाये मेरे।
अब तो तेरी ही सरगम पर,
मेरे गीत ढला करते हैं;
मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,
मुझसे ही हो गये पराये।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

प्रस्तर प्रतिमा ------[ डाo श्याम गुप्त ]

वे बहुत बड़े ज्ञानी हैं ,
विद्वान् हैं,नामी हैं, मानी हैं;
ऊँचे पद पर बैठे हैं ,
स्वयं में बहुत ऊंचाई समेटे हैं |
जनता उनके पास पहुँच भी नहीं पाती है,
उनकी ओर देखने पर ,
लोगों की टोपी गिर जाती है |
वे जन जन के काम कहाँ आते हैं,
वे आदमी कहाँ ,
पत्थर की निर्जीव मूर्ति नज़र आते हैं ||

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

संतुलन ---- अगीत ------- [डा श्याम गुप्त ]

विकास हेतु,
संसाधन दोहन की ना समझ होड़ ,
अति शोषण की अंधी दौड़;
प्रकृति का संतुलन देती है बिगाड़,
विकल हो जाते हैं नदी सागर पहाड़,
नियामक व्यवस्था तभी तो करती है यह जुगाड़;
चेतावनी देती है,
सुनामी बनाकर सब कुछ देती है उजाड़ ,
करने को अपना संतुलन ,सुधार

बुधवार, 27 जनवरी 2010

अवतरण ---- (डा श्याम गुप्त )

यह कंचन सा रूप तुम्हारा,

निखर उठा सुरसरि धारा में,

जैसे सोनपरी सी कोई ,

हुई अवतरित सहसा जल में,

अथवा पद वंदन को उतरा ;

स्वयं इंदु ही गंगा- जल में ||

बुधवार, 13 जनवरी 2010

समन्वय-----( डाo श्याम गुप्त )

आशा का उत्साह का गति का,

रहे समन्वय , तो जीवन है |

तजें निराशा, तेज़ न दौड़ें ,

निरुत्साह का दामन छोड़ें ;

जो न कर सका यथा समन्वय,

कहाँ सफलता उस जीवन में ||