मेरे जीवन की चेतना कातुम अमृत होडूबा रहता है कलम सा मन मेरातुम्हारेख्यालो की स्याही मेसुबह शामबाह्य आवरण है दिनचर्या के कामजैसे अपने बाहुपाश मे भरसुरक्षित रखता हैमुझेमेरी देह का यह मकानमेरी इसकल्पना के वीरान संसारमेतुमफूलो की पंखुरियों सी कोमलशीतल जल के बहाव सी रेतपर हो अंकितएक गीत चल चल कल कलकिरणों और बादलो के पल पलबदलते रंगों के धागों सेबनी पोशाक की हो तुम धारणपहाड़ से उतरती हुवीविचार मगनातुम उदगम से चलीअकेलीचिंतन-धारा हो तनहायाखुबसूरत ,मनमोहक ,प्रकृति होसोचती रहना....पर मुझ कवि की भावुकता काहे शाश्वत यौवनामत करना उपहाससमझो हम दोनों हैएक दूजे...