(विभिन्न रंगों से रंगी एक प्रस्तुति, हालिया समय का स्वरूप, गर्मी का भयावह रूप,)जालिम है लू जानलेवा है ये गर्मीकाबिले तारीफ़ है विद्दुत विभाग की बेशर्मीतड़प रहे है पशु पक्षी, तृष्णा से निकल रही जानसूख रहे जल श्रोत, फिर भी हम है, निस्फिक्र अनजानन लगती गर्मी, न सूखते जल श्रोत, मिलती वायु स्वक्षगर न काटे होते हमने वृक्षलुटी हजारों खुशियाँ, राख हुए कई खलिहानडराता रहता सबको, मौसम विभाग का अनुमानअपना है क्या, बैठ कर एसी, कूलर,पंखे के नीचे गप्पे लड़ाते हैंसोंचों क्या हाल होगा उनका, जो खेतों खलिहानों में दिन बिताते हैअब मत कहना लगती है गर्मी, कुछ तो करो...