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शनिवार, 14 मार्च 2009

सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं। डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।अनुबन्ध आज सारे, बाजार हो गये हैं।। न वो प्यार चाहता है, न दुलार चाहता है,जीवित पिता से पुत्र, अब अधिकार चाहता है,सब टूटते बिखरते, परिवार हो गये हैं।सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।। घूँघट की आड़ में से, दुल्हन का झाँक जाना,भोजन परस के सबको, मनुहार से खिलाना,ये दृश्य देखने अब, दुश्वार हो गये हैं।सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।। वो सास से झगड़ती, ससुरे को डाँटती है,घर की बहू किसी का, सुख-दुख न बाटँती है,दशरथ, जनक से ज्यादा लाचार हो गये हैं।सम्बन्ध आज सारे, व्यापार हो गये हैं।। जीवन के हाँसिये पर, घुट-घुट...

हिन्दी साहित्य मंच - एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान हेतु

हिन्दी साहित्य मंच द्वारा एक सामूहिक प्रयास हिन्दी उत्थान हेतु । साहित्य के नये, युवा रचनाकार ,कविओं और हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में उभरते हुए लोगों के लिए । यह मंच आपके सुझाव एवं आमंत्रण को स्वीकार करता हैं । इस प्रयास में आपकी भागीदारी अत्यंत आवश्यक और महत्तवपूर्ण है ।भाषा के विकास और गिरते स्तर को देखकर यह मंच स्थापित किया गया है ।हमारी आपकी सहभागिता से ही विकास के पथ को अग्रसर किया जा सकता है । साथ ही एक महत्तवपूर्ण प्रश्न यह भी आता है कि हम किस तरह से कार्य करें कि सफलता के नये रास्ते और नये आयाम तक पहुंचा जा सके । आप अपनी बात कहें और...