जब भी निदाघ में उठी है हवा, तुम याद आई होश्वास में जब भरी कोई सुगंधि, तुम याद आई हो यूँ तो मंदिरों मंदिरों न कभी घूमा किया अभागाजब भी ये सर कहीं झुका, तुम याद आई हो फूल दैवी उपवनों के भू पर खिले हैं घर-घर मेंजब भी दिखा निश्छल कोई शिशु, तुम याद आई हो संगीत-सी ललित कविता-सी कोमल अयि कामिनीकिसी लय पर जो थिरकी हवा, तुम याद आई हो जो तुम वियुक्त तो हर धड़कन लिथड़ी रक्ताक्त अश्रु मेंकभी औचक जो मुस्कराया, तुम याद आई हो जलती आग सी सीने में, है धुआँ-धुआँ साँसों का राजजब फैली कहीं भी उजास, तुम याद आई हो मरुस्थली सा जीवन, वसंत मात्र स्वप्न है सुजीत काजब भी...