
कल रात नींद न आई करवट बदल बदल कर कोशिश की थी सोने कीआखें खुद बा खुद भर आईतुम्हारे न आने परमैं उदास होता हूँ जबभीऐसा ही होता है मेरे साथफिर जलाई भी मैंने माचिस औरबंद डायरी से निकली थी तुम्हारी तस्वीर कुछ ही देर में बुझ गयी थी रौशनीऔर उसमे खो गयी थीतुम्हारी हसीजिसे देखने की चाहत लिए मैं गुजर देता था रातों कोसजाता था सपने तुम्हारेतारों के साथचाँद से भी खुबसूरतलगती थी तुमहाँ तुम से जब कहता येसबतुम मुस्कुराकरमुझे पागलकहकर कर चिढाती थीमुझे अच्छा लगता थातुमसे...