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रविवार, 13 दिसंबर 2009

सत्य ! तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ---------- (प्रताप नारायण सिंह )

सत्य !तुम्हें मैं जीना चाहता हूँ ।चेतनता के प्रथम पग पर हीमुझे ओढ़ा दिए गएआवरणों के रंध्रों में छुपेतृष्णा के असंख्य नन्हे विषधरोंके निरंतर तीक्ष्ण होते गए विषदंतों सेक्षत विक्षत,अचेतना के भँवर में डूबते उतराते,तुम्हारे गात कोअपनी आँखों में भरना चाहता हूँ.प्रचलन और परिपाटियों से जन्मे,मेरे भ्रामक अहम कीजिजीविषा के लिए,तुम्हारे हिस्से की रोटी छीनकर,अनवरत तुम्हें भूखा रख कर,हड्डियों पर चढ़े खाल कापुतला बना दिए गएतुम्हारे बदन कोस्पर्श करना चाहता हूँ.मेरी निरर्थकश्रेष्ठता सिद्धि केनिरंतर बढ़ते गएदबावों से झुक करदुहरा हुएतुम्हारे मेरुदंड कोस्व के साहस...