प्रिये ,आज तुम फिर क्यों ?इतनी देर से आयी हो ,तुम्हारे इंतजार में मैंनेकितने ही सपने सजायेपर तुम्हारे बगैर ये कितनेअधूरे से हैं ।मैंने तो कितनी ही बारतुमसे शिकायत कीपरतुमने हमेशा ही अपनीमुस्कुराहट से ,जीत लिया मुझे,तुमसे इस तरह तुम्हारी शिकायत करनाअच्छा लगता है मुझे ,प्रिये,तुम्हारा इंतजार करते- करतेमैंनें बंद कर ली थी आंखें,बंद आंखों में तुम्हारीयादे तैरने लगी थी ,एक उम्मीद थी किशायद इन यादों के साथनींद के आगोश मेंसमा जाऊं मैं ,करवटें बदल- बदल करकोशिश की थी ,रात भर सोने कीपरसफल न हो सका था ।कमरे के दरवाजे सेमंदिर के जलते दियेकी रोशनी ,चांद की...