एक लम्हा दिल फिर सेउन गलियों में चाहता है घूमनाजहाँ धूल से अटे ....बिन बात के खिलखिलाते हुएकई बरस बिताये थे हमने ..बहुत दिन हुए ...........फिर से हंसी की बरसात काबेमौसम वो सावन नहीं देखा ...बनानी है एक कश्ती कॉपी के पिछले पन्ने से,और पुराने अखबार के टुकडों से..जिन्हें बरसात के पानी में,किसी का नाम लिख कर..बहा दिया करते थे ...बहुत दिन हुए .....गलियों में छपाक करते हुएदिल ने वो भीगना नहीं देखा .....एक बार फिर से बनानी है..टूटी हुई चूड़ियों की वो लड़ियाँ,धूमती हुई वह गोल फिरकियाँ,और रंगने हैं होंठ फिर..रंगीन बर्फ के गोलों...और गाल अपने..गुलाबी बुढ़िया...