अलमस्त हो जाय प्रभा की मधुर बेलाछेड़ दो वो प्रीत-गीत फिर से विहागमिटें निज मन के मनभेद सभीदेश-काल, अन्तराल का भेद मिटाने को हे सरित सुनाओ राग अज्ञान तिमिर सब हिय से मिट जायबस संचारित हो तो स्नेह सौहार्द और मोहमधुप की मधुर गुन-गुन सुनकरकटे जन्म-जन्मातर के विछोह जगे अन्तरम में इक ललक ऐसीविजय-मार्ग रोके न भय, कभी बन कारासुकर्म कर रचे नवयुग ऐसास्नेह सुरभि से सुवासित हो जग-सारा ...