मुश्किलें आती रही, हादिसे बढ़ते गये ।मंज़ि़लों की राह में, क़ाफ़िले बढ़ते गये ।दरमियाँ थी दूरियाँ, दिल मगर नज़दीक़ थेपास ज्यूँ-ज्यूँ आये हम, फ़ासले बढ़ते गये ।राहरवों का होंसला, टूटता देखा नहींग़रचे दौराने-सफ़र, हादिसे बढ़ते गये ।साथ रह कर भी बहम हो न पाई ग़ुफ़्तग़ूख़ामशी के दम ब दम, सिलसिले बढ़ते गये ।हम थे मंज़िल के क़रीब, और सफ़र आसान थायक-ब-यक तूफ़ां उठा, वस्वसे बढ़ते गये ।किस्सा-ए-ग़म से मेरे कुछ न आँच आई कभीमेरे दुख और उनके 'पुरु' क़हक़हे बढ़ते गये...