भूखमानव तन से लिपटी सिमटीएक ऐसी लड़ीजो जोड़ती हैजिन्दगी में अनेक कड़ी।कहीं भूख है रोटी की,तो कहीं दौलत की,किसी को भूख शोहरत की,तो किसी को ताकत की,कत्ल हुआ किसी का भूख में,लुट गया मानव तन भी भूख में।भूख ने दिये अंजाम हमेशाअच्छे और बुरे,मिली हमें आजादीभूखे रहकरआजादी की भूख में,पर..लुटा गये शांति अपनीचन्द सिक्कों की भूख में।कब खत्म होगी भूखइस मानव मन की?शायद आज...शायद कल...याशायद कभी नहीं?...