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रविवार, 24 मई 2009

अखबार

अखबारमैं रोजाना पढ़ता हूँ अखबारइस आशा के साथकि-धुंधलके को चीरती सूर्य आभालेकर आई होगी कोई नया समाचार....।लेकिन पाता हूँरोजाना प्रत्येक कॉलम कोबलात्कार, हत्या,और दहेज कि आग से झुलसताया फिर धर्म की आड मेंखूनी होली से सुर्ख सम्पूर्ण पृष्ठसाथ में होता हैराजनेताओं का संवेदना संदेशआतंकवाद के प्रति शाब्दिक आक्रोशजो इस बात का अहसास दिलाता हैसरकार जिन्दा तो है हीसंवेदनशील भी है।तभी तो ढ़ू्ढते हैं वे हर सुबहनिंदा और शोक संदेशों मेंअपना नाम ।फिर भी न जाने क्योंअखबार में बदलती तारीखऔर नित नये विज्ञापनमुझे हमेशा आकर्षित करते हैंजिससे मैं देश की प्रगति कोसरकारी...

[कविता ] - भूतनाथ "रास्ता होता है....बस नज़र नहीं आता.........."

कभी-कभी ऐसा भी होता हैहमारे सामने रास्ता ही नहीं होता.....!!और किसी उधेड़ बून में पड़ जाते हम....खीजते हैं,परेशान होते हैं...चारों तरफ़ अपनी अक्ल दौडाते हैंमगर रास्ता है कि नहीं ही मिलता....अपने अनुभव के घोडे को हम....चारों दिशाओं में दौडाते हैं......कितनी ही तेज़ रफ़्तार से ये घोडेहम तक लौट-लौट आते हैं वापसबिना कोई मंजिल पाये हुए.....!!रास्ता है कि नहीं मिलता......!!हमारी सोच ही कहीं गूम हो जाती है......रास्तों के बेनाम चौराहों में.....ऐसे चौराहों पर अक्सर रास्ते भीअनगिनत हो जाया करते हैं..........और जिंदगी एक अंतहीन इम्तेहान.....!!!अगर इसे एक...