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रविवार, 31 मई 2009

कैसा अपना बचपन था [ एक कविता ]

आईस पाइस का खेल खेलते ,मिट्टी के घर बनाते थे,फिर बिगाड़ देते थे ,मां से थोड़े समान मांगतेफिर एक चूल्हे पर उसे पकाते थे,बनता क्या कुछ याद नहीं,फिर भी अच्छा लगता था ,नदियों में किनारे पर जा जाकर,भीगते और सब को भीगाते थे,कंकड़ ,और शीपी को लेकर,उसकी एक माला बनाते थे,बंदरों की तरह उछलकर ,छोटे पेड़ो पर चढ़जाते थे,कभी बात बात पर गुस्सा होते ,रोते , चिढ़ते , मारते ,फिर भी एक साथ हो जाते थे,ऐसा अपना बचपन था.झूठी कहानी भूतों वाली से,अपने साथियों को डराते थे,स्कूल से झूठा बहाना बनाकर ,खेतों में हम छिप जाते थे,मम्मी के मार से बचने को ,न जाने क्या क्या जतन...