वो आई जैसे चुपके से सौन्दर्य सुरभि लेकर आती है, सावन की तरूनाइ्र्रमेरे मन में बस गई ऐसैजैसै बस जाता है, अलि का गुंजनकली-कली में...पुलकित हुआ मैंपाकर उसकी सोख-पर-संयत अदायेंछाने लगी प्रीत फिर जैसे कारे नभ में इन्द्रधनुष खिल जाये...हर्षाने लगे ओस-कण तरूपात मेंसजने लगे उज्ज्वल स्वप्नचाॅदनी रात में!
बस अब पुष्प को कलि बन खिलना थाबेकल थे दोनो, दोनो को मिलना थापर...पर न जाने क्या हुआ, क्यूॅ मैं हुआ विक्षिप्तक्यूॅ खोने लगा तिमर में अनुराग दीप्तअमा के चन्द्र की तरह जाने कहाॅ खो गईकरके मेरे जीवन को पतछड सा विरान...अब...