हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

निशांदेही - आशीष दुबे

तेरी आंखें शिकारियों सी सधीमेरे मन के पटल पे तैर गयींनींद चिंहुकी तो, पाया जैसे इन्‍हेंमुद्दतों से तलाश मेरी थीकितने जन्‍मों की प्‍यास थी कि जिसेसातवें आसमान की थी खबररूह के साथ जिसकी जद्दोजहदरूह के आरपार तैरी थीऔर फिर सिर्फ जिसके ही खातिरबूंद बन कर मेरा उतरना हुआउस जलनखोर की निशांदेहीमेरी सूरत में आ के ठहरी थी* * *विषबुझे तीर सी तुम्‍हारी हंसीदर्द से अकड़ा हुआ मेरा बदनहर तरफ जकड़ी हुई जंजीरेंजिन्‍दगी बांह तक उधेड़ी थीमेरी दो-चश्‍मी रूह के पीछेजिन अंधेरों में तुम चमकती रहींमैं उन्‍हें चीर करके लौटा हूंजिस जगह पर मज़ार मेरी थी--...