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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

वर्ष का आरम्भ ----(राहुल उपाध्याय )

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ कीक्यूंकि तब डायरी बदली जाती थीपहले प्रतीक्षा रहती थी वर्षा के आरम्भ कीजो सावन की बदली लाती थीअब कम्प्यूटर के ज़माने में डायरी एक बोझ हैऔर बेमौसम बरसात होती रोज हैबदली नहीं बदलीज़िंदगी है बदलीबारिश की बूंदे जो कभी थी घुंघरु की छनछनआज दफ़्तर जाते वक्त कोसी जाती हैं क्षण क्षणपानी से भरे गड्ढे जो लगते थे झिलमिलाते दर्पणआज नज़र आते है बस उछालते कीचड़जिन्होने सींचा था बचपनवही आज लगते हैं अड़चनरगड़ते वाईपर और फिसलते टायरदोनो के बीच हुआ बचपन रिटायरबदली नहीं बदलीज़िंदगी है बदलीकभी राम तो कभी मनोहारी श्यामकभी पुष्प तो...