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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

अरिमान (कविता)-----विजय कुमार शर्मा

१. अरिमान - एक जो बिछुर रहें जग की चाल सेउन्हें रफ़्तार पे ला दूँ मैंजो मचा रहें हो भीम उछल कूंदउन्हें शांति का पाठ पढ़ा दूँ मैंजो बढ़ रहें हो सरहदों से आगेउन्हें सरहदों में रहना सिखा दूँ मैंमेरे जीवन का एक तुष्य ख्वाबजग में रामराज बना दूँ मैंन चले गोंलिया न बहे खूनन कहीं कोई कैसा मातम होहर दर पे उमरे बस खुशीहर घर उन्नति का पालक होचहचहाता आंगन हो सबकाहर कोई समृधि श्रष्टि का चालक होमेरे जीवन की एक बिसरी कल्पनाहो एक देव जो दैत्यों का घालक हो२. अरिमान - दो आये मेरे में इतना सामर्थबंजर में भी फसल उगा दूँ मैंजो मुरझा रहे पंचतत्वो के वाहकउन्हें...