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शनिवार, 4 दिसंबर 2010

राख़ का ढेर -----{वंदना गुप्ता}

मुझमें न ढूंढ मुझेराख के ढेर में अबकोई चिनगारी नहीउम्र भरइक चिता जलती रहीलकडियाँ कम पड़ गयींतो अरमान सुलगते रहेजब कुछ न बचातो राख बन गईबरसों से पड़ी है येकोई इसे भी उठाने न आयाअब तो इस राख पर भीवक्त की धूल जम गई हैइसे हटाने में तोजन्मों बीत जायेंगेफिर बताओकहाँ से ,कैसेमुझे मुझमें पा...