हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

शुक्रवार, 12 जून 2009

कलम की यात्रा

थक गई कलम,शब्द अर्थहीन हो गए,सूख गई स्याही,रचनाएं भी अब निष्प्रभावी हो गईं।हो गया क्या यह सब?क्यों हो गया यह सब?समय की गति के आगे,हर मंजर संज्ञा-शून्य हो गया है अब।याद आता है अभी भीइस भूलने वाली अवस्था में,जब थाम कर हाथों में कलम,पहली बार रची थी कुछ पंक्तियाँ,सजाई थी कागज पर एक कविता।बाल मन, बाल सुलभ उड़ान कोमिल गए थे कल्पनाओं के पर,कभी सूरज, कभी चन्दाउतर रहे थे आसमान से जमीं पर।कभी तोता, मैना सजते,कभी उड़ती थीं रंगीन तितलियाँकागज के जंगल पर।कभी सरदी, कभी गरमीतो कभी बारिश की रिमझिम होती रहती,ऊंचे पहाडों, हरे-भरे मैदानों में दौड़ते रहते,उड़ते रहते...