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रविवार, 29 अगस्त 2010

पुरुष वेश्याएं , आधुनिकता की नयी उपज--------मिथिलेश दुबे

हाँ आपको सुनने में अटपटा जरूर लगा होगा . हाँ होगा भी कैसे नहीं है भी अटपटा .अगर इसे आधुनिकता की नयी खोज कहा जाये तो तनिक भी झूठ न होगा . पहले वेश्यावृत्ति का शब्द मात्र महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाता था , लेकिन अब जब देश विकाशसील है तो बदलाव आना तो लाजिमी हैं ना. अगर देखा जाये तो वेश्या मतलब वो जिन्हें पुरुष अपने वासना पूर्ति के लिए प्रयोग करते थें , इन्हे एक खिलौना के माफिक प्रयोग किया जाता था, वाशना शांत होने के बाद इन्हे पैसे देकर यथा स्थिति पर छोड़ दिया जाता था . पुरुष वर्ग महिलाओं प्रति आकर्षित होते थे और ये अपनी वासना पूर्ति के लिए जिन्हें...

शनिवार, 28 अगस्त 2010

एक कविता "भारतेंदु की" सन्तोष कुमार "प्यासा"

वैसे तो भारतेंदु जी की सभी रचनाएँ मुझे प्रिय है, लेकिन उनकी एक कविता जो मेरे ह्रदय को छूती है उसे मै आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ! निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन। पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।। ************************************* निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्लै है सोय। लाख उपाय अनेक यों, भले करे किन कोय।। इक भाषा इक जीव इक, मति सब घर के लोग। तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।। ************************************ और एक अति लाभ...

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

"कोई हो ऐसा" {कविता} ---वंदना गुप्ता

कभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोहमारे रूह कीअंतरतम गहराइयों में छिपीहमारे मन की हरगहराई को जानेकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोसिर्फ़ हमें चाहेहमारे अन्दर छिपेउस अंतर्मन को चाहेजहाँ किसी की पैठ न होकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोहमें जाने हमें पहचानेहमारे हर दर्द कोहम तक पहुँचने से पहलेउसके हर अहसास सेगुजर जाएकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोबिना कहे हमारी हर बात जानेहर बात समझेजहाँ शब्द भी खामोश हो जायेंसिर्फ़ वो सुने और समझेइस मन के गहरे सागर मेंउठती हर हिलोर कोहर तूफ़ान कोऔर बिना बोलेबिना कुछ कहे वो हमें हम से चुरा लेहमें हम...

बुधवार, 25 अगस्त 2010

कभी-कभी सोचती हू.....(कविता)--सुमन 'मीत

जाने क्या है जाने क्या नहीबहुत है मगर फिर भी कुछ नहीतुम हो मै हू और ये धराफिर भी जी है भरा भराकभी जो सोचू तो ये पाऊमन है बावरा कैसे समझाऊकि न मैं हू न हो तुमबस कुछ है तन्हा सा गुम.......................!...

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

रक्षा बंधन

हिन्‍दू श्रावण मास (जुलाई-अगस्‍त) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह त्‍यौहार भाई का बहन के प्रति प्‍यार का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती है और उनकी दीर्घायु व प्रसन्‍नता के लिए प्रार्थना करती हैं ताकि विपत्ति के दौरान वे अपनी बहन की रक्षा कर सकें। बदले में भाई, अपनी बहनों की हर प्रकार के अहित से रक्षा करने का वचन उपहार के रूप में देते हैं। इन राखियों के बीच शुभ भावनाओं की पवित्र भावना होती है। यह त्‍यौहार मुख्‍यत:...

सोमवार, 23 अगस्त 2010

त्रिपदा अगीत ------डाo श्याम गुप्त.

१..अंधेरों की परवाह कोई, न करे, दीप जलाता जाए; राह भूले को जो दिखाए | २.सिद्धि प्रसिद्धि सफलताएं हैं,जीवन में लाती हैं खुशियाँ;पर सच्चा सुख यही नहीं है| ३.चमचों के मजे देख हमने ,आस्था को किनारे रख दिया ;दिया क्यों जलाएं हमीं भला| ४.जग में खुशियाँ उनसे ही हैं,हसीन चेहरे खिलते फूल;हंसते रहते गुलशन गुलशन | ५.मस्त हैं सब अपने ही घरों में ,कौन गलियों की पुकार सुने;दीप मंदिर में जले कैसे...

रविवार, 22 अगस्त 2010

तेरा धर्म महान कि मेरा धर्म---------मिथिलेश दुबे

तेरा धर्म महान कि मेरा धर्ममची है लोगों मे देखो कैसी घमासानबन पड़ा है देखो कैसा माहौललग रहे हैं एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपक्या हो जायेगा अगर मेरा धर्म नीचातेरा धर्म महानआखिर पिसता तो है इन सबके बीच इंसानजहाँ खाने के लिए रोटी नहींपहनने के लिए वस्त्र नहींरहने के लिए घर नहींवहां का मुद्दा बन पड़ा हैतेरा धर्म महान कि मेरा धर्म महान,,,,,,,,,,,जहाँ फैला है भ्रष्टाचार चहूं ओरजहाँ नेता बन बैठा है भाग्य बिधाताजहाँ अशिक्षा हावी है शिक्षा परजहाँ देखने वालों की भी गिनती है अंधो मेंवहाँ मुद्दा बन पड़ा हैतेरा धर्म महान कि मेरा धर्म .......जहां मां तोड‍ देती...

शनिवार, 21 अगस्त 2010

अरे हम बंदी किसके थे जो हमें कोई आजाद करेगा हमने तो उन्हें केवल व्यापर के लिए चंद समय और जगह दी थी.. Ankur Mishra "YUGAL"

आखिर आ ही गया हमारी स्वतंत्रता का ६४वा वर्ष ! चलिए हम जरा विचार करते है की हमने , हमारे भारत के लिए इन ६४ वर्षों में कितने महान कार्य और कितने सराहनीय कार्य किये है, जिनसे हमारा और हमारे मुल्क का विकाश हुआ है! जी हा हम कह रहे है अब ६४ वर्ष जो अब बीत चुके है जो बहुत ज्यादा होते है, आजकल तो एक मनुष्य की उम्र भी नहीं होती इतनी .... फिर भी हम उनसे पीछे क्यों है, क्या हमारे पास संसाधनों की कमी है ,क्या हमारे पास तकनीक की कमी है ,क्या हमारे पास दिमाग की कमी है ,क्या हमारे पास शक्ति की कमी है???नहीं हम किसी में भी काम नहीं है !हम एक अरब से...

शमशान-----{कविता}----- वंदना गुप्ता

दुनिया के कोलाहल से दूरचारों तरफ़ फैली है शांति ही शांतिवीरान होकर भी आबाद है जोअपने कहलाने वालों के अहसास से दूर है जोनीरसता ही नीरसता है उस ओरफिर भी मिलता है सुकून उस ओरले चल ऐ खुदा मुझे वहांदुनिया के लिए कहलाता है जो शमशान य...

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

सपना .........................श्यामल सुमन

बचपन से ही सपन दिखाया, उन सपनों को रोज सजाया।पूरे जब न होते सपने, बार-बार मिलकर समझाया।सपनों के बदले अब दिन में, तारे देख रहा हूँ।सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।पढ़-लिखकर जब उम्र हुई तो, अवसर हाथ नहीं आया।अपनों से दुत्कार मिली और, उनका साथ नहीं पाया।सपन दिखाया जो बचपन में, आँखें दिखा रहा है।प्रतिभा को प्रभुता के आगे, झुकना सिखा रहा है।अवसर छिन जाने पर चेहरा, अपना देख रहा हूँ।सपना हुआ न अपना फिर भी, सपना देख रहा हूँ।।ग्रह-गोचर का चक्कर है यह, पंडितजी ने बतलाया।दान-पुण्य और यज्ञ-हवन का, मर्म सभी को समझाया।शांत नहीं होना था ग्रह को, हैं...

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

रक्तदान मे डेरा सच्चा सौदा बेमिसाल ......(लेख)..............मोनिका गुप्ता

रक्तदान महादान होता है .. हमे रक्तदान जरुर करना चाहिए .. ये बाते आमतौर पर लोगो को जागरुक करने के लिए कही जाती है ताकि लोग इसकी जरुरत जाने और आगे आकर लोगो की जिंदगी बचाए ... लेकिन जहाँ एक लाख से ज्यादा लोग इक्ट्ठे हो और कतार मे इस विश्वास से लगे हो कि चाहे कुछ हो जाए ... रक्त देकर ही जाना है तो उन लोगो के इस जज्बे को क्या नाम देंगे. ये कोई कल्पना नही हकीकत है और यह बात सामने आई सिरसा के डेरा सच्चा सौदा मे जहाँ कल यानि 8 अगस्त रविवार को संत महाराज गुरमीत राम रहीम जी के जन्म माह के पावन उपलक्ष मे विशाल रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया. लगभग...

बुधवार, 11 अगस्त 2010

मैं तो बस ....(कविता)

न कोई मजहब है मेरा न कोई भगवान हैमैं तो बस इन्सान हूँ इंसानियत मेरी पहचान है..न कभी मंदिर गया मैंन कभी गुरूद्वारे में मैं तो बस देखता हूँ सबमें ही भगवान है .न किसी से इर्ष्या हो न किसी से बैर हो मैं तो बस ये चाहता हूँ सबमें ख़ुशी और प्रेम हो पढता हूँ मैं खबर शहर कत्लेआम की हो दुखी नम आँखों सेक्या खुदा , क्या राम है..आज मैं मैं कर रहा कल खाक में मिल जाऊंगा सांसे टूट जाएगी एक दिनक्या साथ मेरे जायेगा ...आओ हम ये दूरी मिटा दें न कोई हो दुर्भावना राम पूजे मुसलमान हिन्दू खुदा...

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कभी सोचती हू...........(कविता)................ सुमन 'मीत'

 जाने क्या है जाने क्या नहीबहुत है मगर फिर भी कुछ नही तुम हो मै हू और ये धराफिर भी जी है भरा भरा कभी जो सोचू तो ये पाऊमन है बावरा कैसे समझाऊकि न मैं हू न हो तुम बस कुछ है तन्हा सा गुम.........................

डायरी {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

मुझे मत समझना महज एक डायरी मै हूँ किसी की ज़िन्दगी, किसी की शायरी कुछ लोग समझते है मुझे अपनी प्रेमिका मुझसे चलती है कई लोगों की आजीविका कवी,लेखक,. प्रेमी हो या विद्वान, सभी मुझे अपनाते है निज ह्रदय के गूढ़ राज मुझमे छाप जाते है मै महज एक शौक नहीं, मै हूँ वेदना किसी के उर की मुझमे लिखी है दास्ताँ किसी के तसव्वुर की मुझमे मिल सकते है किसी दार्शनिक के हितकारी विचार मुझमे अंकित अक्षर बन सकते है, प्रलयकारी तलवार मुझमे क्षमता है, मै बदल सकती हूँ समाज मुझसे कुछ छुपा नहीं, मै हूँ राज की हमराज..........

सोमवार, 9 अगस्त 2010

कितने पास कितने दूर ...---(लेख) मोनिका गुप्ता

जमाना नेट का है. चारो तरफ कम्प्यूटर ही दिखाई देते हैं .बहुत अच्छा लगता है यह जान कर कि निसंदेह हम प्रगति के पथ पर अग्रसर है. जहाँ तक नौजवानो की बात है उनमे सीखने की लग्न बडो से कही ज्यादा है और वो ना सिर्फ जल्दी से सीख भी लेते हैं बलिक अपने बडो को भी सीखा देते हैं. पर सारा दिन उससे चिपके बैठे रहना भी तो सही नही है ना खाने की चिंता ना पढाई की. एक ही घर मे रहते हुए भी ऐसा लगता है कि सुबह से कोई बात ही नही हुई. स्कूल, कालिज या दफ़्तर से आते ही बस लगे रहते हैं कम्प्यूटर में ...कल ही मेरे एक मित्र खुशी खुशी बता रहे थे कि उन्होनें वेब केम लिया है...

रविवार, 8 अगस्त 2010

उड़ गया फुर से परिंदा डाल से...(ग़ज़ल)...............राजेन्द्र स्वर्णकार

भर गए बाज़ार नक़ली माल सेलीचियों के खोल में हैं फ़ालसेलफ़्ज़ तो इंसानियत मा'लूम हैहै मगर परहेज़ इस्तेमाल से ना ग़ुलामी दिल से फ़िर भी जा सकी हो गए आज़ाद बेशक़ जाल सेभूल कर सिद्धांत समझौता कियाअब हरिश्चंदर ने नटवरलाल से खोखली चिपकी है चेहरों पर हंसीहैं मगर अंदर बहुत बेहाल सेज़िंदगी में ना दुआएं पा सकेअहले-दौलत भी हैं वो कंगाल सेसोचता था…ज़िंदगी क्या चीज़ हैउड़ गया फुर से परिंदा डाल सेइंक़लाब अंज़ाम दे आवाम क्याज़िंदगी उलझी है रोटी-दाल सेशाइरी करते अदब से दूर हैंचल रहे राजेन्द्र टेढ़ी चाल...

शनिवार, 7 अगस्त 2010

मिलते ही मैं गले नहीं लगता.....ग़ज़ल....manoshi ji

लोग मुझको कहें ख़राब तो क्याऔर मैं अच्छा हुआ जनाब तो क्याहै ही क्या मुश्तेख़ाक से बढ़ करआदमी का है ये रुआब तो क्याउम्र बीती उन आँखों को पढ़तेइक पहेली सी है किताब तो क्यामैं जो जुगनु हूँ गर तो क्या कम हूँकोई है गर जो आफ़ताब तो क्याज़िंदगी ही लुटा दी जिस के लियेमाँगता है वही हिसाब तो क्यामिलते ही मैं गले नहीं लगताफिर किसी को लगा खराब तो क्याआ गया जो सलीका-ए-इश्क अब’दोस्त’ मरकर मिला सवाब तो क...

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

थम सा गया है वक्त....(गजल)...................नीरज गोस्वामी

होगी तलाशे इत्र ये मछली बज़ार मेंनिकले तलाशने जो वफ़ा आप प्‍यार मेंचल तो रहा है फिर भी मुझे ये गुमाँ हुआथम सा गया है वक्त तेरे इन्तजार मेंजब भी तुम्हारी याद ने हौले से आ छुआकुछ राग छिड़ गये मेरे मन के सितार मेंकिस्मत कभी तो पलटेंगे नेता गरीब कीकितनों की उम्र कट गयी इस एतबार में दुश्वारियां हयात की सब भूल भाल करमुमकिन नहीं है डूबना तेरे खुमार मेंये तितलियों के रक्स ये महकी हुई हवालगता है तुम भी साथ हो अबके बहार मेंवो जानते हैं खेल में होता है...

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

हकीकत........................श्यामल सुमन

जो रचनाएँ थी प्रायोजित उसे मैं लिख नहीं पायास्वतः अन्तर से जो फूटा उसे बस प्रेम से गायाथी शब्दों की कभी किल्लत न भावों से वहाँ संगम,दिशाओं और फिजाओं से कई शब्दों को चुन लायाकिया कोशिश कि सीखूँ मैं कला खुद को समझने कीकठिन है यक्ष-प्रश्नों सा है बारी अब उलझने कीघटा अज्ञान की मानस पटल पर छा गयी है यूँ,बँधी आशा भुवन पर ज्ञान की बारिश बरसने कीबहुत मशहूर होने पर हुआ मगरूर मैं यारोनहीं पूरे हुए सपने हुआ मजबूर मैं यारोवो अपने बन गए जिनसे कभी रिश्ता नहीं लेकिन,यही चक्कर था अपनों से हुआ हूँ दूर मैं यारोअकेले रह नहीं सकते पड़ोसी की जरूरत हैअगर अच्छे मिलें...

बुधवार, 4 अगस्त 2010

आठवीं रचना..............लघु कथा............... ( डा श्याम गुप्त )

  कमलेश जी की यह आठवीं रचना थी | अब तक वे दो महाकाव्य, दो खंड काव्य व तीन काव्य संग्रह लिख चुके थे | जैसे तैसे स्वयं खर्च करके छपवा भी चुके थे | पर अब तक किसी लाभ से बंचित ही थे | आर्थिक लाभ की अधिक चाह भी नहीं रही| जहां भी जाते प्रकाशक, बुक सेलर ,वेंडर, पुस्तक भवन, स्कूल, कालिज, लाइब्रेरी एक ही उत्तर मिलता , आजकल कविता कौन पढ़ता है ; वैठे ठाले लोगों का शगल रह गया है, या फिर बुद्धि बादियों का बुद्धि-विलास | न कोई बेचने को तैयार है न खरीदने को | हां नाते रिश्तेदार , मित्रगण मुफ्त में लेने को अवश्य लालायित रहते हें , और फिर घर में इधर-उधर...

रविवार, 1 अगस्त 2010

दिल में ऐसे उतर गया कोई.............(ग़ज़ल)................मनोशी.

दोस्त बन कर मुकर गया कोई  अपने दिल ही से डर गया कोईआँख में अब तलक है परछाईंदिल में ऐसे उतर गया कोईसबकी ख़्वाहिश को रख के ज़िंदा फिरख़ामुशी से लो मर गया कोईजो भी लौटा तबाह ही लौटाफिर से लेकिन उधर गया कोई"दोस्त" कैसे बदल गया देखोमोजज़ा ये भी कर गया ...