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शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

" बातों में गुम ".........ललित कर्मा


दो लड़कियों को देखा

कचरा बीन रही थी,

चार-पांच साल उम्र रही थी,

दोनों की,

वह जा रहा था,

सायकल पर हो सवार,

रोज की तरह,

जब जाता है वह ,

देखता है मकान-दुकान,

गाड़ी-घोड़े, आते-जाते लोग,

सहसा दो ये बालिकाएँ भी दिख पड़ी,

उसने मुझसे पूछा,

तुम्हे कुछ होता है?,

ऐसा देखता है जब,

मैंने कहा - मुझे क्या होगा?

तुझ जैसा मैं भी हूँ,

दो बातें तू कह लेगा,

और उनको चार बना कर,

मैं कह दूंगा,

इन्ही बातों में बच्चियाँ गुम हो जाएगी,

वे बच्चियाँ जो कचरा बीन रही थी|

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मंगलवार, 4 जनवरी 2011

शरद ॠतु कि अगुवाई में.............(सत्यम शिवम)

शरद ॠतु कि अगुवाई में,
पेड़ों के पते सिहर गए,
ठंडक ने ठिठुराया तन को,
अकुलाहट के सारे पल गए।

इक सुहानी सुबह,
हौले हौले बहती हवाएँ,
प्रकृति की मधुरता को देख,
पंक्षियों ने सुरीले गीत गाए।

कँपकपाने लगी ठँडक से तन,
नदियों में जल भी जम गए।


शरद ॠतु कि अगुवाई में,
पेड़ों के पते सिहर गए,

मौसम ये बड़ा निराला है,
अब आसमान भी काला है,
झम झम बारिश होने वाली,
शरद ॠतु का ये पाला है।

सब घर में है छिप गए,
जैसे वक्त सारे थम गए।

शरद ॠतु कि अगुवाई में,
पेड़ों के पते सिहर गए,

स्वेटर पहनो,ओढ़ो कम्बल,
घर में अलाव भी गया है जल,
रहना इस मौसम में जरा सम्भल,
ऊनी कपड़े है बस ठंडक का हल।

जल की इक बूँद पड़ी जो तन पर,
हम न जाने क्यों सहम गए। 

शरद ॠतु कि अगुवाई में,
पेड़ों के पते सिहर गए,

ठंडक ने ठिठुराया तन को,
अकुलाहट के सारे पल गए।