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शनिवार, 22 मई 2010

सीख................(गजल).................श्यामल सुमन

रो कर मैंने हँसना सीखा, गिरकर उठना सीख लिया।
आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया।। 

महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं।
सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया।। 

दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने।
धन को ही परमेश्वर माना, अवसर चुनना सीख लिया।।

रिश्ते भी बाज़ार से बनते, मोल नहीं अपनापन का। 
हर उसूल अब है बेमानी, हँटकर सटना सीख लिया।। 

फुर्सत नहीं किसी को देखें, सुमन असल या कागज का।
जब से भेद समझ में आया, जमकर लिखना सीख लिया।।

शुक्रवार, 21 मई 2010

गर चाहते हो ...........(कविता)...........संगीता स्वरुप

दिया तो
जला लिया है
हमने ज्ञान का
पर आँख में
मोतियाबिंद
लिए बैठे हैं .
रोशनी की कोई
महत्ता नहीं
जब मन में अन्धकार
किये बैठे हैं .

आचार है हमारे पास
पर
व्यवहार की कमी है
चाहते हैं पाना
बहुत कुछ
पर हम मुट्ठी
बंद किये बैठे हैं .

चाहते हैं
सिमट जाये
हथेलियों में
सारा जहाँ
जबकि
हम खुद ही
कर - कलम
किये बैठे हैं .

चाहते हैं पाना
नेह की
सुखद अनुभूति
लेकिन
हृदय - पटल
बंद किये बैठे हैं ..

गर चाहते हो कि
ऐसा सब हो
तो --
खोल दो
सारे किवाड़
आने दो एक
शीतल मंद बयार
मन - आँगन
बुहार दो
नयन खोल
दिए में
तेल डाल दो
मोतियाबिंद
हटा दो
हृदय के पट खोलो
प्रेम को बांटो
बाहें फैलाओ
और जहाँ को समेट लो .....



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