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शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

समंदर - कविता ( मधुलिका की प्रस्तुति )

इतना कि _
जितना उससे नहीं हो सकता था
हूलते हुए दर्द को पी जाना सहज न था
तब तो वह जानती ही न थी
दर्द कहते किसे हैं

वह तो _
खेलते हुए ठोकर लग जाने को
दर्द का का नाम देकर
माँ के आँचल के खूंटे से बाँध आती थी

तब तो पता ही न था
कि - पहली बार किए गए प्यार में भी
खून कि धार का दर्द लिपटा होता है
और
मिलन की सारी उमंग
सहसा भय की सिसकियों में बदल जाया करती है
इसी को तो कौमार्य व्रत भंग कहते हैं
और तब सहसा
भूली हुई कुंती याद आती है
यह कैसा लोक लाज है
जिसे लाज नहीं आती ।

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

इंसान

समूचा जन-समुदाय कलियुग की आपदायें सहता हुआ त्राहि-त्राहि कर रहा था। जन-समुदाय की करुण पुकार पर आसमान में एक छवि अंकित हुई और आकाशवाणी हुई-
‘‘तुम लोग कौन?’’
एक छोटे से समूह से आवाज उभरी-‘‘हिन्दू।’’
और आसमान से एक हाथ ने आकर उस हिन्दू समुदाय को आपदाओं से मुक्त कर दिया। अभी भी कुछ लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे। पुनः आकाशवाणी हुई-
‘‘तुम लोग कौन?’’
शेष जन-समूह के एक छोटे से भाग से स्वर उभरा-‘‘मुसलमान।’’
पुनः एक हाथ ने मुस्लिम समुदाय को भी आपदाओं से बचा लिया। अभी भी कुछ लोग शेष थे। पुनः वही प्रश्न गूँजा-
‘‘तुम लोग कौन?’’
भीड़ का एक छोटा सा हिस्सा चिल्लाया-‘‘ईसाई।’’
एक और हाथ ने उस समूह का भी भला किया। प्रश्न उभरते रहे, उत्तर गूँजते रहे, हाथ आते रहे, लोग बचते रहे। आसमान से फिर वही प्रश्न उभरा-
‘‘तुम लोग कौन?’’
अबकी बहुत थोड़े से बचे लोगों की आवाज सुनाई दी-‘‘इन्सान।’’
इस समूह को बचाने कोई भी हाथ नहीं आया। आसमान पर उभरी वह छवि भी लुप्त हो गई और ‘इन्सान’ इसी तरह त्राहि-त्राहि करता रहा।