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शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

" मेरी बहन तु सलामत रहे" - मिथिलेश दुबे

हे ईश्वर मै तुझसे बहुत प्यार करता हुं,
तुझ पर,मै अपना सबकुछ न्योछावर करता हुं,
पर मै अपनी बहन पे तुझसे ज्यादा विश्वास करता हुं।


हो अगर खता कभी तू माफ करना मुझे और मेरी बहन को,
देना पङे यदि सजा, तो देना मुझे, बचा लेना मेरी बहन को।


मेरी बहन लाखो, करोणो मे नही , बल्की इस दुनियां मे सिर्फ मे एक है,
लग जाये उसको मेरी सारी उम्र, यदि इस वसुन्धँरा मे कोई नेक है।


धन्यवाद देता हूं तुझको, है उस पर मुझे नाज ,
हे गुङिया गर्व करेगा तुझ पर आने वाला पूरा समाज ।


मेरी बहन होने पर आपको धन्यवाद देता हुं
इस दुनियां की सारी खूशिया उपहार देता हुं
रहो सलामत, रहो चाहे जहां भगवान से बस यही दुआ करता हुं।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

कविता - प्रकाश गोविंद जी की

प्रश्न बन जाए भले जीवन-मरण का
प्यार करना तो मगर अवगुण नहीं है !
कब गगन ने बैर माना उस नियति से
जो लगाती सूर्य पर स्याही निशा की,

कब कली करती निरादर उस किरण का
जो गयी तो दे गयी गहरी उदासी,
जिन्दगी में दर्द का क्रंदन बहुत है
प्यार का लेकिन अकेला क्षण बहुत है
हारकर सब बाजियां भी प्यार पाए
तो मनुज की आत्मा निर्धन नहीं है !

इन पहाड़ी चोटियों को क्या पता है
कौन चन्दन आख़िरी होगा बिछौना
बेसगुन आती मुहूरत भाल पर
जब मौत की जोगन लगा जाती दिठौना

यों ख़ुशी से मौत को किसने वरा है
प्यार बिन जीना मगर उससे बुरा है
मौत को भी सरल कर दे कुसुम सा
प्यार से ज्यादा गुनी मुमकिन नहीं है !

क्या हुआ जो फट गयी चूनर जरी की
जात तो पहचान में आई चुभन की
चांदनी इतनी न होती चंद्रमा में
जो न तकलीफें सही होती ग्रहण की

रात ने जितनी सुरा तम की चढ़ा ली
रोशनी उतनी पुतलियों ने बढा ली
हुबहू सूरत दिखाने को जगत की
दर्द से बढ़कर कहीं दर्पण नहीं है !

मोरपंखी ज्योति तिरती है नयन में
वेणु स्वर सा गूंजता है छंद कोई
मिलन-बिछुडन की हदों से पार देखो
प्राण का हो प्राण से सम्बन्ध कोई

लोक अपयश दे भले, चाहे सराहे
पीर हो हर सांस का पर्याय चाहे
लौट कर कान्हा भले आये न आये
पूजती राधा मगर निर्गुण नहीं है !