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शनिवार, 16 मई 2009

मेरी तनहाई...[एक कविता ] - गार्गी गुप्ता

मेरे पास है बस मेरी तनहाई
बस इसी ने ही दोस्ती निभाई।
जब छोड रही थी मुझे मेरी परछाई
तब इसी ने आकार हिम्मत बंधाई।।

है पास मेरे मेरी तन्हाई
फिर किसी से रखु कैसी रुसबाई।
चन्द लम्हो में सारा जहाँ लुट गया
एक दौलत बची वो थी तनहाई।।

भूल बैठे थे हम इस हसी दोस्त को
पर चुप रह कर भी जो साथ चली वो थी मेरी तन्हाई ।
भरोसा है मुझे जब कोई साथ न होगा
तब साथ देगी मेरा मेरी तनहाई।।

तू अगर साथ है तो फिर कैसी रुसबाई
बस एक तू ही मेरे मन को है भाई।
संग चलती है मेरे खामोश रह कर
किस कदर शुक्रिया अदा करु मैं अदा मेरी तनहाई ।।

शुक्रवार, 15 मई 2009

घर का चूल्हा [एक कविता ] - प्रस्तुति " शम्भू चौधरी जी " की


घर का चूल्हा जलता देखा


चूल्हे में लकड़ी जलती देखी
उस पर जलती हाँड़ी देखी,
हाँड़ी में पकते चावल देखे,
फिर भी प्राणी जलते देखे।
घर का चूल्हा जलता देखा।।

हाय.. रे..घर...का..चूल्हा...
घर का चूल्हा जलता देखा।।

खेतों में हरियाली देखी
घर में आती खुशीयाली देखी
बच्चों की मुस्कान को देखा,
मन में कोलाहल सा देखा,
मंडी में जब भाव को देखा
श्रम सारा पानी सा देखा।

हाय.. रे..घर...का..चूल्हा...
घर का चूल्हा जलता देखा।।

घर का चूल्हा जलता देखा
बर्तन-भाँडे बिकता देखा
हाथ का कंगना बिकता देखा,
बिकती इज़्ज़त बच्चों को देखा
खेते -खलियानों को बिकता देखा
हल-जोड़े को बिकता देखा।

हाय.. रे..घर...का..चूल्हा...
घर का चूल्हा जलता देखा।।

बैल को जोता, खुद को जोता,
बच्चों और परिवार को जोता
ब्याज का बढ़ता बोझ को जोता
सरकार को जोता, फसल को जोता,
घरबार- परिवार को जोता
दरबारी-सरपंच को जोता,

हाय.. रे..घर...का..चूल्हा...
घर का चूल्हा जलता देखा।।

मुर्दों की संसद को देखा
बन किसान मौज करते देखा,
घर का चूल्हा जलता देखा
बेच-बेच ऋण चुकता देखा
फिर किसान को मरता देखा
फांसी पर लटकता देखा।

हाय.. रे..घर...का..चूल्हा...
घर का चूल्हा जलता देखा।।


शम्भु चौधरी, एफ.डी.-453/2,
साल्टलेक सिटी, कोलकाता-700106, मोबाइल: 0-9831082737.