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रविवार, 1 मई 2011

नया दौर ................डॉ कीर्तिवर्धन

नया दौर
नये दौर के इस युग में
सब कुछ उल्टा पुल्टा है|
महंगी रोटी सस्ता मानव
जगह जगह पर बिकता है.|
कहीं पिंघलते हिम पर्वत तो
हिम युग का अंत बताते हैं,|
सूरज की गर्मी भी बढ़ती
अंत जहाँ का दिखता है.|
अबला भी अब बनी है सबला
अंग परदर्शन खेल में|
नैतिकता का अंत हुआ है
जिस्म गली में बिकता है.|
रिश्तो का भी अंत हो गया
भौतिकता के बाज़ार में,
कौन पिता और कौन है भ्राता
पैसे से बस रिश्ता है.|
भ्रष्ट आचरण आम हो गया
रुपया पैसा खास हो गया,
मानवता भी दम तोड़ रही
स्वार्थ दिलों में दिखता है.|
पत्नी सबसे प्यारी लगती
ससुराल भी न्यारी लगती,
मात पिता संग घर में रहना
अब तो दुष्कर लगता है. |

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

सिर्फ तुम {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"




ये चाहत थी दिल की 
या प्यार का पागलपन
तनहाइयाँ थी, रुशवाइयां थीं 
पर सुना न था दिल का अंजुमन
जब तुम न थे,
तब भी थे सिर्फ तुम,
जब तुम थे तब भी थे, 
सिर्फ तुम,
अब तुम नहीं हो,
लेकिन फिर भी हो 
सिर्फ तुम !
मैंने तो हर एक खता का इकरार किया
खुद से ज्यादा तुम पर ऐतबार किया
पर फिर भी क्यूँ न हो सके तुम मेरे 
क्यूँ मिली मुझे तुम्हारी बेरुखी,
 और गम के अँधेरे,
मेरी चाहत तो कुछ ज्यादा न थी,
मैंने तो सिर्फ चाहा, तुम मेरा साथ दो
मेरे हांथों में तुम, खुद अपना हाथ दो !
करो मुझे  शिकवे गिले
और मैं न कुछ बोलूं
बस बता दो क्या थी मेरी गलती
मै तुम्हारे बाँहों में जी भर कर रोलूं !
अगर है तुम्हे, थोड़ी सी भी फिक्र मेरी 
तो रोक लो मुझे, नहीं मै हो जाऊंगा,
 तनहाइयों में गुम,
तुम्हारे दिल की तो पता नहीं मुझे 
जब तुम न थे,
तब भी थे सिर्फ तुम,
जब तुम थे तब भी थे, 
सिर्फ तुम,
अब तुम नहीं हो,
लेकिन फिर भी हो 
सिर्फ तुम !