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रविवार, 4 अप्रैल 2010

आँखों को बेनूर कर रहा पानी.....(आलेख).........मीनाक्षी अरोड़ा


बिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम, बरहरा के शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह और अन्य परिवारों में जन्में नवजात शिशुओं की आँखों में रोशनी नहीं है। इनकी आँखों में रोशनी जन्म से ही नहीं है। बिहार के सबसे ज्यादा आर्सेनिक प्रभावित भोजपुर जिले में पिछले कुछ दिनों के अंदर 50 ऐसे बच्चों के मामले मीडिया में छाये हुए हैं जिनकी आँखों का नूर कोख में ही चला गया है।

मामला प्रकाश में लाने वाले आरा के एक विख्यात नेत्र विशेषज्ञ हैं- डॉ. एसके केडिया, जो कहते हैं कि "जन्मजात अंधापन के दो मामले लगभग छह महीने पहले मेरे अस्पताल में आये थे। उस समय मुझे कुछ गलत नहीं लगा था। लेकिन जब इस तरह के मामले पिछले तीन महीने में नियमित अंतराल पर मेरे पास आने शुरू हुए तो मुझे धीरे-धीरे यह एहसास हुआ कि यह एक नई चीज है, मेरे 20 साल के कैरियर में जन्मजात अंधापन के मामले इतनी बड़ी संख्या में कभी नहीं आये थे।“

भोजपुर के लोग अपने नवजात शिशुओं को लेकर डरे सहमे से अस्पताल पहुँच रहे हैं। वे नहीं जानते कि उनका नन्हा सा बच्चा देख सकता है कि नहीं। क्योंकि शुरुआत में बच्चे में इस तरह के कोई लक्षण दिखाई नहीं देते कि वे देख पा रहे हैं या नहीं। लोग अपना जिला छोड़कर राजधानी पटना के अस्पतालों में भी बच्चों की जांच करा रहे हैं। वे अपने बच्चों के बारे में किसी समस्या को सार्वजनिक भी नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके सामाजिक ताने-बाने पर भी असर पड़ेगा।

सरकार और उससे जुड़ी हुई विभिन्न स्वास्थ्य एजेन्सियां इस तरह के मामलों के पीछे का सही कारण पता करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हुई हैं। लोगों को आशंका है कि इसके लिये पानी में मिला आर्सेनिक जिम्मेदार है। हालांकि भोजपुर के जिला सिविल सर्जन डॉ. केके लाभ कहते हैं कि मोबाइल फोन के टावरों से निकला इल्क्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन भी बच्चों के अंधेपन का कारण हो सकता है। हम लोग सही कारण जानने की कोशिश कर रहे हैं। इस पूरे मामले में प्रमाणित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर एक चीज तो साफ है कि पर्यावरणीय प्रदूषण ही मुख्य कारण नजर आ रहा है।

अभी तक देखा गया है कि आर्सेनिक युक्त जल के निरंतर सेवन से लोग शारीरिक कमजोरी, थकान, तपेदिक, (टीबी.), श्वाँस संबंधी रोग, पेट दर्द, जिगर एवं प्लीहा में वृद्धि, खून की कमी, बदहजमी, वजन में गिरावट, आंखों में जलन, त्वचा संबंधी रोग तथा कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। पर गर्भ में ही बच्चों के अंधा होने की घटनाओं का होना एकदम नया मोड़ है।

भोजपुर जिले का मुख्यालय आरा में आरोग्य संस्था के डॉ मृत्युंजय कुमार कई आशंकाएं व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि पहला कारण तो वंशानुगत हो सकता है। दूसरा कारण हो सकता है कि गर्भावस्था के दौरान दी जा रही किसी गलत दवा का असर हो। तीसरा यह भी हो सकता है कि आर्सेनिक से प्रभाव का यह कोई नया रूप हो, क्योंकि आर्सेनिक मानव के तंत्रिका तंत्र और स्नायु तंत्र पर असर तो करता ही है।

भोजपुर, बिहार में सबसे अधिक आर्सेनिक प्रभावित जिलों में से एक है। पिछले साल बिहार में कराये गए एक सर्वे में 15 जिलों के भूजल में आर्सेनिक के स्तर में खतरनाक वृद्धि दर्ज की गई थी। आर्सेनिक प्रभावित 15 जिलों के 57 विकास खंडों के भूजल में आर्सेनिक की भारी मात्रा पायी गई थी। सबसे खराब स्थिति भोजपुर, बक्सर, वैशाली, भागलपुर, समस्तीपुर, खगड़िया, कटिहार, छपरा, मुंगेर और दरभंगा जिलों में है। समस्तीपुर के एक गाँव हराईछापर में भूजल के नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 2100 पीपीबी पायी गई जो कि सर्वाधिक है। जबकि भारत सरकार के स्वास्थ्य मानकों के अनुसार पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 50 पीपीबी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 10 पीपीबी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

पानी में मिला आर्सेनिक बिहार ही नहीं पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, पंजाब सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। आज पानी कहीं कैंसर तो कहीं बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी, शारीरिक-मानसिक विकलांगता बाँट रहा है। माँ के गर्भ में ही बच्चों से आँखे छीन लेने वाले पानी की एक नई सच्चाई हमारे सामने आने वाली है। हालांकि यह सच अभी आना बाकी है कि असली कारण क्या हैं पर जो भी हैं वे पानी- पर्यावरण प्रदूषण के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेंगे। लेकिन इसके साथ यह भी एक कड़वा सच है कि इन सब के पीछे इन्सान ही जिम्मेदार है।

धरती में जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें।
हालात धीरे-धीरे ऐसे होते जा रहे हैं कि धरती की कोख सूनी होती जा रही है। जमीन के नीचे पानी काफी कम हो गया है और जितना पानी बचा है उसकी एक-एक बूँद लोग निचोड़ लेना चाहते हैं। धरती की कोख को चीर कर उसके हर कतरे को लोग पी जाना चाहते हैं। सरकारें और उनकी नीतियां नलकूप, बोरवेल, डीपबोरवेल लगा-लगाकर धरती की कोख से सबकुछ निकाल लेना चाहती हैं।

सूनी धरती, सूखी धरती से जब पानी बहुत नीचे चला जाता है तब पानी कम, खतरनाक केमिकल ज्यादा मिलने लगते हैं। तभी पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अब तो यूरेनियम भी मिलने लगा है। जब पानी आसमान से बरसता है तब उसमें कोई जहर नहीं होता। जब बारिश का पानी झीलों, तालाबों, नदियों में इकट्ठा होता है तब हमारे पैदा किए गए कचरे से प्रदूषित हो जाता है। पहले पानी झीलों, तालाबों, नदियों से धरती में समा जाता था लेकिन अब पानी के लिये सारे रास्ते हम धीरे-धीरे बंद करते जा रहे हैं। धरती में पानी कम जा रहा है जितना हम डालते हैं उसका कई गुना निकाल रहे हैं। ऐसे में सूखी होती धरती की कोख अब अमृत रूप पानी नहीं जहर उगल रही है। धरती की खाली होती कोख जहर उगल रही है और माओं की कोख जन्मना अंधी संतानें। यह नहीं होना चाहिए, फिर क्या होना चाहिए?

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

नाजुक हैं आदमी ...(लेख ).......मोनिका गुप्ता

सुन कर आप सोच रहे होगे कि भला आदमी और नाजुक ... हो ही नही सकते ... लेकिन यह बात काफी हद तक सही है हालांकि अपवाद तो हर जगह होते हैं असल मे .. आदमी खुद दिखाते नही हैं .. जैसाकि महिला करती है कि तुरंत रोना शुरु कर देती हैं लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज्यादातर आदमियो का दिल एक दम मोम की तरह होता है ..पर वो मजबूत हैं बस यह दिखाने की कला उन्हे आती है ..अभी कुछ दिन पहले मेरी सहेली अपने बच्चे को स्टेशन छोड्ने आई तो उसने बताया कि इसके पापा इसे छोड्ने कभी नही आते वो तो इसे बाय भी नही बोल सकते ..इसके एक दिन जाने से पहले ही वो उदास हो जाते हैं ..पापा को देख कर बेटा भी उदास हो जाता है ....इसलिए उसे ही हमेशा मन पक्का करके छोड्ने आना पडता है ..

एक हमारे पडोसी हैं जब से उनकी बेटी की शादी हुई है तब से वो चुप से हो गए है .. बेटी जब भी मिलने घर आती है वो उससे गले लग कर खूब रोते है ..अब जब उसके भी बेटी हो गई है .. उनके वापिस जाने के बाद वो अकेले बैठ कर खूब रोते हैं .. हार कर उनकी पत्नी को मन मजबूत करके उन्हे चुप करवाना पडता है ..

एक मित्र तो और भी कमाल है ..उनकी लड्की 25 साल की हो गई है .. जब भी उसके लिए कोई रिश्ता आता है तो वो किसी छोटे बच्चे की तरह रोने लग जाते हैं ..

दीपक जब से पेपर मे प्रथम आया और उनके घर जब भी बधाई का फोन आता उसके पापा भावुक हो उठते..

मोहन जी की पत्नी जब तक अस्प्ताल मे थी वो उनसे मिलने नही गए क्योकि वो उन्हे बीमार नही देख सकते थे .. वो अपना ही दिल पकड कर बैठ गए कि उन्हे ही कही कुछ ना हो जाए ..

ऐसे ना जाने कितने उदाहरण है इस बारे मे ... जिससे बस एक ही बात सामने आती है कि आदमी भी नरम दिल के इंसान होते हैं बस वो दिखाते नही है अपने दिल मे ही रखते है यह बात आपको भी पता होगी ... है ना ... तो अगर आप किसी को पत्थर दिल आदमी बोले तो बोलने से पहले सोच लें ..