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शनिवार, 26 सितंबर 2009

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ-------- " जतिन्दर परवाज़"

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ



मुश्किलें हैं सफर में क्या क्या कुछ



फूल से जिस्म चाँद से चेहरे



तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ



तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी



हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ



ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता



था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ



शाम तक तो नगर सलामत था



हो गया रात भर में क्या क्या कुछ



हम से पूछो न जिंदगी ‘परवाज़’



थी हमारी नजर में क्या क्या कुछ

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

शाम

शाम की छाई हुई धुंधली

चादर से

ढ़क जाती हैं मेरी यादें ,

बेचैन हो उठता है मन,

मैं ढ़ूढ़ता हूँ तुमको ,

उन जगहों पर ,

जहां कभी तुम चुपके-चुपके मिलने आती थी ,

बैठकर वहां मैं

महसूस करना चाहता हूँ तुमको ,

हवाओं के झोंकों में ,

महसूस करना चाहता हूँ तुम्हारी खुशबू को ,

देखकर उस रास्ते को

सुनना चाहता हूँ तुम्हारे पायलों की झंकार को ,

और

देखना चाहता हूँ

टुपट्टे की आड़ में शर्माता तुम्हारा वो लाल चेहरा ,

देर तक बैठ

मैं निराश होता हूँ ,

परेशान होता हूँ कभी कभी ,

आखें तरस खाकर मुझपे,

यादें बनकर आंसू उतरती है गालों पर ,

मैं खामोशी से हाथ बढ़ाकर ,

थाम लेता हूं उन्हें टूटने से ,

इन्ही आंसूओं नें मुझे बचाया है टूटने से ,

फिर मैं उठता हूं

फीकी मुस्कान लिये

एक नयी शुरूआत करने ।