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बुधवार, 26 अगस्त 2009

बादलों में चांद छिपता

बादलों में चांद छिपता है,


निकलता है ,

कभी अपना चेहरा दिखाता है ,

कभी ढ़क लेता है ,

उसकी रोशनी कम होती जाती है

फिर अचानक वही रोशनी

एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेज होती जाती है ।

मैं इस लुका छिपी के खेल को

देखता रहता हूँ देर तक,

जाने क्यूँ बादलों से

चांद का छिपना - छिपाना

अच्छा लग रहा है ,

खामोश रात में आकाश की तरफ देखना ,

मन को भा रहा है ,

उस चांद में झांकते हुए

न जाने क्यूँ तुम्हारा नूर नजर आ रहा है ।

ऐसे में तुम्हारी कमी का एहसास

बार - बार हो रहा है ।

तुम्हारी यादें चांद ताजा कर रहा है,

मैं तुमको भूलने की कोशिश करके भी ,

आज याद कर रहा हूँ ,

इन यादों की तड़प से

मन विचलित हो रहा है ,

शायद चांद भी ये जानता है कि-

मैं तुम्हारे बगैर कितना तन्हा हूँ ?

अधूरा हूँ ,

ये चांद तुम्हारी यादें दिलाकर

तुम्हारी कमी को पूरा कर रहा है

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

" राजनीति साहित्य जगत की "- नरेन्द्र कुमार

राजनीतिज्ञो की राजनीति देखी

धर्म, सम्प्रदाय में राजनीति दिखी

जाति, भाषा से बंटे लोग देखे


देखा भाई-भतीजावाद का हर वो चेहरा


पर साहित्यकारों में भी राजनीति होगी


इसकी कभी परिकल्पना नहीं कि थी मैंने


सब दिखा हंस और पाखी के प्रतिवाद में


उस ज्ञान पीठ पुस्कार से


जिसे समृद्ध ज्ञानत्व वालें लोगो को दिया जाता है


आलोचक रचनाकारों के तेवरों ने भी


दिखाया राजनीति का चेहरा


दिखाया कैसे एक साहित्यकार


साहित्य के क्षेत्र में एक छत्र


राज करने को लालायित रहता है


अपनी ही पत्रिका और लेखनी को


सर्वोच्च ठहराने की जुगत करता है


इस क्रम में एक-दूसरे पर आक्षेप


करने से भी नहीं चूकता


आदतें उन तमाम राजनीतिज्ञों की तरह


जो अपने ही दल को देश का प्रहरी मानता है


और दूसरे को देश का दुश्मन


उन धर्मनिर्पेक्ष और साम्प्रदायिक ठेकेदारों की तरह


जिन्हें न तो देश से लगाव है न ही देशवासियों से


ज्ञान बांटने वाले ये लोग

अज्ञानता की राजनीति से गुजरते देखे जायेंगे


नवीन कवियों और लेखको के लिए

यह बेहद चिंता का विषय है


खेमेबाजी की इस दौर में


नये उभरते लेखकों को


एक खेमा चुनने की विवशता


कहीं उनके लेखनी में जड़ता न ला दे


जिस समाज को बदलने की आश लिए


नए साहित्यकार अपना कलम चलाते हैं


कहीं उनके मन में डर न समा जाए कि


कौन सा खेमा उनसे ख़ीज खाकर


उसके पन्नों पर ही स्याही न छीड़क दे


निष्कर्ष सोचकर ही हम जैसे


रचनाकारों को डर सा लगने लगा है


कही हमारे पल्लवित होते पंख को भी


आलोचक राजनीति खेमेबाजी कर कुतर न डालें।