हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ताजमहल

ताजमहल के नीचे तहखाने में
कुलबुलाने लगती हैं दो आत्मायें
चिपट जाती हैं वे एक दूसरे से
कहीं कोई अलग न कर दे उन्हें
दबे पाँव बाहर आती हैं
अपनी ही रची सुंदरता को निहारने
पर ये क्या ?
बाहर देखा तो यमुना जी सिमटती नजर आयीं
दूर-दूर तक गड़गड़ करती मशीनें
कोलाहल और धुँओं के बीच
काले पड़ते सफेद संगमरमर
कैमरों के फ्लैश के बीच
उनकी बनायी सुंदरता पर दावे करते लोग
अचानक उन्हें ताज दरकता नजर आया
वे तेजी से भागकर
अपनी-अपनी कब्रों में सिमट गए !!
कृष्ण कुमार यादव

सोमवार, 13 जुलाई 2009

ऐ दिल कहीं और चलें


हर ओर है आज दंगा, अत्याचार मचा,
माराकाटी के इस दौर से कोई नहीं बचा,
डरता हूँ मैं इस खूनी दौर से बहुत,
भाग कर इस दौर से ऐ दिल कहीं और चलें।
.
नहीं जहाँ में चैन न अमन ही रहा,
मानव अब तो अपने साये से डर रहा,
कत्ल न कर दे कहीं खुद हमारा साया,
डर से कत्ल होने के ऐ दिल कहीं और चलें।
.
लुट गये खजाने खुशियों के हम सभी के,
छीन ले गये हर खुशी दामन से हमारे,
गमगीन माहौल में जीना लगता है मुश्किल,
खुशी एक पल की पाने ऐ दिल कहीं और चलें।
.
बसेगा कब चमन खुशहाली का यहाँ,
मिटाकर अँधेरा कब उजाला फैलेगा यहाँ,
चाह है एक सुन्दर शांतिमय संसार की,
जहाँ प्यारा सा बसाने ऐ दिल कहीं और चलें।