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सोमवार, 18 मई 2009

बड़ा कठिन है
टूटते परिवारों में रिश्तों की डोर थामें रखना ,
नहीं रही कोई अहमियत परिवारों से जुड़े पवित्र बंधन की ,
आलीशान मकानों के बीच छिप सा गया है घर ,
किसी ईट पत्थर की चुनाई में दरक रहा है विश्वास ,
अपनी छत के नीचे अब दीवारों से नहीं टकराते अनुभव बुजुर्गों के,
बच्चों को नहीं सुनने मिलती ,दादी नानी की कहानिया ,
नहीं होती शरारत देवर भाभी के बीच , मुंह फेर लेते हैं भाई भी नजर
टकराने पर ,ये सच है जर , जोरू , जमीन की ,।जंग छिड़ी है चहुंओर लेकिन अस्तित्व बचाने , मजबूत रखनी होगी रिश्तों की डोर ।
By

Mridul purohit, son of shantinath purohit, 6/129, khandu colony, banswada, rajasthan.

अन्तर्राष्ट्रीय हाईपर्टेन्शन डे-व्यंग [निर्मला जी ]

अब क्या कहें एक और दिन आ गया मनाने के लिये इन्ट्र्नैशनल हाईपरटेन्शन डे मै ये तो नही जानती कि इसे कैसे ? और किस को मनाना चाहिये ? मगर एक बात की खुशी है किमुझे इसे मनाने मे कोई ऐतराज या परेशानी नहि है आप लोग भी परेशान मत होईये हमरे देश मे आजकल ये दिन मनाने के लिये माहौल भी है और लोग भी हैं जिन्हें हाईपरटेन्शन हो गयी है उनमें कुछ तो वो जो प्रधानमंन्त्री बनने के सपने देख रहे थे ,पर सपने सपने ही रह गये और कुछ वो जो हार गये कुछ जो बन गये उन्हे आगे की चिन्ता सता रही है के मन्त्रीपद मिलेगा कि नहीं जो वर्कर्स हैं वो भी जोड तोड मे लगे हैं कि अब कौन कौन से लाभ उठायें इस लिये हर शहर मे बडे पैमाने पर ये दिन मनाया जाना चाहिये कि भाई सपने तो जरूर देखो मगर अपने कद और हैसियत के अनुसार अगर बडे सपने देखने ही हैं तो राहुल बाबा की तरह गलियों की खाक छानो और पसीन बहाओ टेन्शन चाहे फिर भी रहेगी पर हाईपरटेन्शन नही होगी इस तरह ये देश हाईपर्टेन्शन से मुक्त हो जायेगा याद रखो ये एक साईलेन्ट किलर है