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रविवार, 12 अप्रैल 2009

"एक विनम्र निवेदन"

हिन्दी साहित्य मंच के प्रबुद्ध पाठकों और सभी ब्लॉगर मित्रों को प्रणाम।
हिन्दी साहित्य मंच आप सभी हिन्दी प्रेमियों का अपना ब्लॉग है। अब तक प्रियवर नीशू तिवारी इसका सम्पादन बड़ी कुशलता और परिश्रम के साथ कर रहे थे। परन्तु उन्हें किसी अपरिहार्य कारण से बाहर जाना पड़ा। न जाने क्या सोच कर वो इसकी जिम्मेदारी मुझ पर डाल गये हैं।
आज मुझे अनुभव हो रहा है कि सम्पादन करना कितना कठिन होता है? इसमें समय व परिश्रम के साथ-साथ साहित्यकार की लेखनी से निकले शब्दों के प्रभाव का भी ध्यान रखना होता है। मैं इसमें कितना सफल हो पाऊँगा, यह कुछ कहा नही जा सकता है।
एक विनम्र निवेदन आपसे करता हूँ कि सम्पादन में मुझसे भूलवश् या अज्ञानता के कारण यदि कहीं कमियाँ रह जायें, तो कृपया नीशू जी के आने तक मुझे क्षमा कर देंगे और पहले की तरह इस मंच को अपना स्नेह प्रदान करते रहेंगे।
शुभकामनाओं के साथ।
सादर- डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
फोन/फैक्सः 05943 - 250207
चलभाष्ः 093684-99921

"कल शाम". सतीश चन्द्र सत्यार्थी

कल शाम
गिर के बिखर गए थे,

बालकनी में,
नीम के कुछ सूखे पत्ते,
ज्यों तेरी खिलखिलाती हंसी

टटकी धूप की एक किरण
खिड़कियों से आकर,
नींद में छू गयी थी माथे को
ज्यों तेरा भींगा स्पर्श

दीवाल-घड़ी भी गिर कर फर्श पर
ज़रा अटक गयी थी
ज्यों तेरे रूठने की अदा

छत की मुंडेर पर आकर ठहर गयी थी,
इतराती सोंधी शाम
ज्यों तेरा खिड़की पे आके ठहर जाना

महुए के पीछे से चाँद,
और शाखों से लिपटी चांदनी ने
देखा था तिरछी नजरों से
ज्यों तेरा शोख निगाहों से देखना

सांझिल हवा का एक झोंका,
जबरन घुस आया था कमरे में
ज्यों तुम्हारी याद।

कल शाम

सतीश चन्द्र सत्यार्थी
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय नई दिल्ली, भारत।